हम विदेश में रहते हुए भी अधिक से अधिक बच्चों को मनोरंजक ढंग से हिन्दी सिखाने में जुटे हुए हैं पर पिछले दिनों टी. वी. के एक कार्यक्रम को देख मन बड़ा दुःखी हुआ।
यह कार्यक्रम था- लिफ्ट करा दे। जिसमें सलमान ख़ान साहब किसी दुःखी व्यक्ति के लिफ्ट के लिए आए हुए थे। कार्यक्रम के अन्त में वह उस व्यक्ति को अपनी दान धर्म का परिचय कराते हुए उसके इलाज का तथा उसके बच्चों की स्कूली पढ़ाई आदि का खर्चा अपने ऊपर लेते हुए सलाह देते हैं कि वह अब अपने बच्चों को किसी अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़ाए। अगर वह यह कहते कि वह किसी अच्छे स्कूल में अपने बच्चों को पढ़ाए तो अच्छा लगता फिर वह अंग्रेज़ी हो या हिन्दी। पर इस तरह अन्तराष्ट्रीय टी.वी. पर अपनी राय अंग्रेज़ी स्कूल के लिए देना हिन्दी स्कूलों का घोर अपमान है। क्या मेरा ऐसा सोंचना ग़लत है? यह मेरे जैसे बिना किसी विशेष आय के बावजूद हिन्दी सिखाने वालों को हतोत्साहित ज़रूर करता है।
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Sunday, February 7, 2010
Thursday, October 29, 2009
व्यथा
बहुत बार मन में आता है कि हिन्दी सिखाने के अतिरिक्त कुछ और भी ब्लाग पर लिखूं पर ब्लाग का नाम कुछ ऐसा है कि कुछ दूसरा उस पर सजता नहीं। पिछले कई सालों से अनेक लोग मुझसे पूछते हैं कि आखिर हम अपने बच्चों को हिन्दी क्यों पढ़ाएं। अब तो भारत में भी बच्चों को हिन्दी का कोई शौक नहीं। मेरा मन दुःखी होता है और यूँ ही शब्दों का रूप ले लेता है-
विदेश आने की
हम सबकी
एक कथा होती है
और उस कथा में
कहीं न कहीं
एक व्यथा होती है
देश छूटते ही हम पाते हैं
खुद को एकाकी और अनाथ
और शरण लेते हैं धर्म की
पकड़ लेते हैं उस भगवान को
कि बस तू ही है
जो अपना था और अपना है
खो देते हैं खुद को और अपनी आत्मा को भी
ढकेलते हैं आने वाली
हर पीढ़ी को धर्म की शरण में
हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख या इसाई
बस यही एक पहचान बल देती है
बाकी सब दूर चला जाता है
मानव धर्म कोने में सिसकता है
मानवता रोती है
क्यों कि आत्मा से परमात्मा की यात्रा
सभी धर्मों का आधार है
और अपनी आत्मा को खो कर
किस परमात्मा को खोजने चले थे
इस पर भी
एक प्रश्न
अनसुना सा खड़ा दिखता है
चुपचाप,
मौन
और कभी
देश छूटते ही
हम उड़ते हैं
उन्मुक्त पंक्षी की तरह
शायद स्वतन्त्रता का अहसास
पहली बार हमें होता है
अपनी भाषा संस्कृति से परे
नये परिवेश को
आत्मसात करने में जुट जाते हैं
वही हमें बल देता है
मानव जीवन की माया नगरी में
माया तांडव करती है
महामाया
नाज़ुक हाथों से
वह हाला पिलाती है
जिसका हर एक जाम
आने वाली अनेक पीढ़ियों तक
ज़हर बन कर उतरता है
इसका अहसास
हमें खुद को नहीं
अगली पीढ़ियों को होता है
और कभी
हम संतुलन खोजते हैं
कुछ पाने के लिए
कुछ खोने को तैयार दिखते हैं
पर, क्या खोएं और क्या पाएं
इस में भी असमंजस है
क्यों कि
देश छूटते ही
एक हम का अहसास दम तोड़ देता है
और तब
पति की, पत्नी की और बच्चों की
खोने और पाने की
अपनी-अपनी
अलग दिशा और प्राथमिकता होती है
ऐसे में
केवल समय
सिखाता है
और दिखाता है
कभी-कभी
खोने और पाने के लिए
कुछ भी शेष नहीं होता
विदेश आने की
हम सबकी
एक कथा होती है
और उस कथा में
कहीं न कहीं
एक व्यथा होती है
देश छूटते ही हम पाते हैं
खुद को एकाकी और अनाथ
और शरण लेते हैं धर्म की
पकड़ लेते हैं उस भगवान को
कि बस तू ही है
जो अपना था और अपना है
खो देते हैं खुद को और अपनी आत्मा को भी
ढकेलते हैं आने वाली
हर पीढ़ी को धर्म की शरण में
हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख या इसाई
बस यही एक पहचान बल देती है
बाकी सब दूर चला जाता है
मानव धर्म कोने में सिसकता है
मानवता रोती है
क्यों कि आत्मा से परमात्मा की यात्रा
सभी धर्मों का आधार है
और अपनी आत्मा को खो कर
किस परमात्मा को खोजने चले थे
इस पर भी
एक प्रश्न
अनसुना सा खड़ा दिखता है
चुपचाप,
मौन
और कभी
देश छूटते ही
हम उड़ते हैं
उन्मुक्त पंक्षी की तरह
शायद स्वतन्त्रता का अहसास
पहली बार हमें होता है
अपनी भाषा संस्कृति से परे
नये परिवेश को
आत्मसात करने में जुट जाते हैं
वही हमें बल देता है
मानव जीवन की माया नगरी में
माया तांडव करती है
महामाया
नाज़ुक हाथों से
वह हाला पिलाती है
जिसका हर एक जाम
आने वाली अनेक पीढ़ियों तक
ज़हर बन कर उतरता है
इसका अहसास
हमें खुद को नहीं
अगली पीढ़ियों को होता है
और कभी
हम संतुलन खोजते हैं
कुछ पाने के लिए
कुछ खोने को तैयार दिखते हैं
पर, क्या खोएं और क्या पाएं
इस में भी असमंजस है
क्यों कि
देश छूटते ही
एक हम का अहसास दम तोड़ देता है
और तब
पति की, पत्नी की और बच्चों की
खोने और पाने की
अपनी-अपनी
अलग दिशा और प्राथमिकता होती है
ऐसे में
केवल समय
सिखाता है
और दिखाता है
कभी-कभी
खोने और पाने के लिए
कुछ भी शेष नहीं होता
Saturday, May 16, 2009
यू.एस.ए. में हिन्दी अक्षर
विदेश में हिन्दी सीखना और सिखाना, भारत में अंग्रेज़ी सीखने से कहीं अधिक कठिन होता है। भारत में हर जगह अंग्रेजी के बोर्ड, किताबें, समाचार पत्र आदि उपलब्ध होते हैं। चेतना आते ही बच्चा अंग्रेजी के अक्षर अपने आसपास देखने लगता है जब कि यहाँ विदेशों में हिन्दी का कोई माहौल ही नहीं होता। हिन्दी के अक्षर कहीं दिखते ही नहीं ।
एक दिन मैं एक प्रदर्शिनी देखने गयी। उस प्रदर्शनी में एक बड़ा सा पंडाल विभिन्न प्रकार के डायनासॉर का भी था। मैं उस पंडाल में घुसने ही वाली थी कि तभी मेरी दृष्टि प्रवेश द्वार के पास रक्खे कुछ लकड़ी के बक्सों पर पड़ी। उन पर हिन्दी के अक्षर लिखे हुए थे। कहीं न दिखने वाले हिन्दी के अक्षर इतने अपने लगे कि मैं डायनसॉर भूल कर अपने बच्चों को वो लकड़ी के बक्से दिखाने लगी। बच्चे भी उत्साहित हो उन अक्षरों को पढ़ने लगे। हमारे परिवार को बक्सों के पास देख कुछ और लोग उत्सुकता वश आए। कुछ लोग छोटे बच्चों को एक अजनबी भाषा पढ़ते देख आनन्द लेने लगे। उस छोटी सी भीड़ को देख कुछ और लोगों ने उत्सुकता वश अपने सिर उस भीड़ में घुसाए और देखते ही देखते वह छोटी सी भीड़ बड़ी होने लगी। मैं आनन्दित हो रही थी अपने बच्चों को देख जो बड़े गर्व के साथ लोगों को पढ़-पढ़ बता रहे थे कि उन बक्सों पर क्या लिखा था।
आप भी उत्सुक होंगे कि आखिर उन बक्सों पर ऐसा क्या विशेष लिखा था। उन पर लिखा था- भारत की स्वादिष्ट दार्जिलिंग चाय।
इतना अवश्य है- हमारा हिन्दी के प्रति उत्साह दूसरों में भी कहीं न कहीं उत्सुकता अवश्य जगाता है।
एक दिन मैं एक प्रदर्शिनी देखने गयी। उस प्रदर्शनी में एक बड़ा सा पंडाल विभिन्न प्रकार के डायनासॉर का भी था। मैं उस पंडाल में घुसने ही वाली थी कि तभी मेरी दृष्टि प्रवेश द्वार के पास रक्खे कुछ लकड़ी के बक्सों पर पड़ी। उन पर हिन्दी के अक्षर लिखे हुए थे। कहीं न दिखने वाले हिन्दी के अक्षर इतने अपने लगे कि मैं डायनसॉर भूल कर अपने बच्चों को वो लकड़ी के बक्से दिखाने लगी। बच्चे भी उत्साहित हो उन अक्षरों को पढ़ने लगे। हमारे परिवार को बक्सों के पास देख कुछ और लोग उत्सुकता वश आए। कुछ लोग छोटे बच्चों को एक अजनबी भाषा पढ़ते देख आनन्द लेने लगे। उस छोटी सी भीड़ को देख कुछ और लोगों ने उत्सुकता वश अपने सिर उस भीड़ में घुसाए और देखते ही देखते वह छोटी सी भीड़ बड़ी होने लगी। मैं आनन्दित हो रही थी अपने बच्चों को देख जो बड़े गर्व के साथ लोगों को पढ़-पढ़ बता रहे थे कि उन बक्सों पर क्या लिखा था।
आप भी उत्सुक होंगे कि आखिर उन बक्सों पर ऐसा क्या विशेष लिखा था। उन पर लिखा था- भारत की स्वादिष्ट दार्जिलिंग चाय।
इतना अवश्य है- हमारा हिन्दी के प्रति उत्साह दूसरों में भी कहीं न कहीं उत्सुकता अवश्य जगाता है।
Tuesday, May 12, 2009
अन्तिम फ़ैसला
यह पोस्ट पिछली पोस्ट का हिस्सा है इसलिए इस पोस्ट में छिपे भाव को समझने के लिए पिछली पोस्ट अवश्य पढ़े।
मेरा दुःखी मन पार्क में अब और रूकने को तैयार नहीं था। इसलिए मैं सामने स्थित एक पब्लिक लाइब्रेरी में चली गयी। मुझे भारतीय वस्त्रों में देख एक लड़की मेरी तरफ आकर्षित हुयी। देखने में तो वह भारतीय नहीं लगती थी पर न जाने कितनी ही बातें वह मुझसे भारत के बारे में करती रही। आखिरकार मुझसे पूछे बिना रहा नहीं गया कि आखिर वह भारत के बारे में इतना कैसे जानती है। तब उसने बताया कि उसके पिता भारतीय (मुम्बई से) हैं और उसकी माँ ग्रीक। फिर यकायक उसने मुझसे पूछा कि मैं अपने बेटे को हिन्दी सिखा रही हूँ या नहीं। उसने अनजाने ही मेरी दुःखती रग पर हाथ रखा था। मेरा मन जो पहले ही भरा हुआ था अपने को रोक न सका और मैंने कुछ पल पहले बीती सारी घटना उससे कह सुनाई और यह भी बताया कि अब आगे मुझे अपने बेटे को हिन्दी सिखाने में कोई रूचि नहीं है।
वह बड़े ध्यान से मेरी सारी बात सुनती रही फिर बड़े अपनेपन से मेरा हाथ अपने हाथों में ले कर बोली- “मैं तुम्हारा दुःख समझ सकती हूँ पर हिन्दी न सिखाने की गलती कभी ना करना। मेरे माता-पिता ने मुझे अपनी-अपनी भाषाएं नहीं सिखाईं जिसके कारण सारे पारिवारिक आयोजनों का हिस्सा हो कर भी मैं स्वयं को वहाँ एक अजनबी सा महसूस करती थी। वो लोग क्या बोलते और क्या हंसी-मज़ाक किया करते थे मैं कभी समझ ही नहीं सकी। मुझे जन्म तो मिला पर परिवार की अनुभूति कभी हुई ही नहीं।“
उसकी बातों से मैं सहम गई। हिन्दी न सिखाने के प्रति लिया गया मेरा फैसला अपनी सच्चाई का विभत्स रूप लिए सामने खड़ा दिखाई दिया। मैंने उसकी आँखों में देखा। उसकी हिन्दी न जानने की पीड़ा मेरी आज की घटना से मिली वेदना से कहीं अधिक थी। मैंने बिना हिन्दी सिखाए अपने बच्चों को भी उस लड़की की जगह खड़े पाया। वह लड़की ईश्वर द्वारा भेजा हुआ एक फ़रिशता सी लगी जिसने मुझे गलत राह पर चलते ही मुझे सम्हाल लिया था। मेरे दुःख के बादलों से आई बदली ने ऐसी बरसात की जिससे मेरी सारी पीड़ा धुल गयी। एक नया सूरज चमक रहा था। एक नया उत्साह था और इतना साफ था- “चाहें जितनी बाधाएं आएं हमें अपने बेटे को हिन्दी सिखाना ही है।“
मेरा दुःखी मन पार्क में अब और रूकने को तैयार नहीं था। इसलिए मैं सामने स्थित एक पब्लिक लाइब्रेरी में चली गयी। मुझे भारतीय वस्त्रों में देख एक लड़की मेरी तरफ आकर्षित हुयी। देखने में तो वह भारतीय नहीं लगती थी पर न जाने कितनी ही बातें वह मुझसे भारत के बारे में करती रही। आखिरकार मुझसे पूछे बिना रहा नहीं गया कि आखिर वह भारत के बारे में इतना कैसे जानती है। तब उसने बताया कि उसके पिता भारतीय (मुम्बई से) हैं और उसकी माँ ग्रीक। फिर यकायक उसने मुझसे पूछा कि मैं अपने बेटे को हिन्दी सिखा रही हूँ या नहीं। उसने अनजाने ही मेरी दुःखती रग पर हाथ रखा था। मेरा मन जो पहले ही भरा हुआ था अपने को रोक न सका और मैंने कुछ पल पहले बीती सारी घटना उससे कह सुनाई और यह भी बताया कि अब आगे मुझे अपने बेटे को हिन्दी सिखाने में कोई रूचि नहीं है।
वह बड़े ध्यान से मेरी सारी बात सुनती रही फिर बड़े अपनेपन से मेरा हाथ अपने हाथों में ले कर बोली- “मैं तुम्हारा दुःख समझ सकती हूँ पर हिन्दी न सिखाने की गलती कभी ना करना। मेरे माता-पिता ने मुझे अपनी-अपनी भाषाएं नहीं सिखाईं जिसके कारण सारे पारिवारिक आयोजनों का हिस्सा हो कर भी मैं स्वयं को वहाँ एक अजनबी सा महसूस करती थी। वो लोग क्या बोलते और क्या हंसी-मज़ाक किया करते थे मैं कभी समझ ही नहीं सकी। मुझे जन्म तो मिला पर परिवार की अनुभूति कभी हुई ही नहीं।“
उसकी बातों से मैं सहम गई। हिन्दी न सिखाने के प्रति लिया गया मेरा फैसला अपनी सच्चाई का विभत्स रूप लिए सामने खड़ा दिखाई दिया। मैंने उसकी आँखों में देखा। उसकी हिन्दी न जानने की पीड़ा मेरी आज की घटना से मिली वेदना से कहीं अधिक थी। मैंने बिना हिन्दी सिखाए अपने बच्चों को भी उस लड़की की जगह खड़े पाया। वह लड़की ईश्वर द्वारा भेजा हुआ एक फ़रिशता सी लगी जिसने मुझे गलत राह पर चलते ही मुझे सम्हाल लिया था। मेरे दुःख के बादलों से आई बदली ने ऐसी बरसात की जिससे मेरी सारी पीड़ा धुल गयी। एक नया सूरज चमक रहा था। एक नया उत्साह था और इतना साफ था- “चाहें जितनी बाधाएं आएं हमें अपने बेटे को हिन्दी सिखाना ही है।“
Monday, May 11, 2009
एक दुःखी दिन
आपकी प्रतीक्षा के लिए धन्यवाद.....
तो मैं यहाँ थी....
मेरा बेटा, जो अब तक दो साल का हो चुका था, हिन्दी अच्छी तरह समझ सकता था । अंग्रेजी की उसे अच्छी समझ नहीं थी। एक दिन मैं उसे एक पार्क में ले कर गई जहाँ दो और अमेरिकन बच्चे बालू में खेल रहे थे। मेरा बेटा, अकेला बच्चा घर में, उस दिन दूसरे बच्चों को देख मचल उठा और ताली बजा-बजा कर कूदने लगा। उन श्वेत बच्चों को मेरे बेटे का कूदना कुछ अटपटा सा लगा और उन्होंने उससे अंग्रेजी में कुछ बात करना चाहा किन्तु अंग्रेजी भाषा का ज्ञान न होने के कारण मेरा बेटा कुछ उत्तर न दे सका और अपनी ही धुन में कूदता रहा। वह अमेरिकन बच्चे भी छोटे ही थे। उन्हें पता नहीं क्या समझ आया। उन्होंने झल्ला कर मेरे बेटे पर दनादन बालू फेंकी। मेरा मासूम बेटा तड़प कर रो पड़ा। मेरे मातृत्व को यह बिलकुल बरदाश्त न हुआ। मैंने झट उसे गोदी में उठा सीने से लगा लिया। बेटे की वेदना असह्य थी। एक अपराध भाव था कि यदि मैंने उसे अंग्रेजी सिखाई होती तो उसे शायद आज यह दिन न देखना पड़ता। सोंचा, बहुत हो गयी हिन्दी। जब रहना यहीं है तो हिन्दी सिखाने का क्या औचित्य। हिन्दी के प्रति लिया गया यह मेरा एक और संकल्प था।
वह दिन यूँ ही वेदना के साथ नहीं कटा। आगे की बात फिर अगली बार लिखूंगी......
तो मैं यहाँ थी....
मेरा बेटा, जो अब तक दो साल का हो चुका था, हिन्दी अच्छी तरह समझ सकता था । अंग्रेजी की उसे अच्छी समझ नहीं थी। एक दिन मैं उसे एक पार्क में ले कर गई जहाँ दो और अमेरिकन बच्चे बालू में खेल रहे थे। मेरा बेटा, अकेला बच्चा घर में, उस दिन दूसरे बच्चों को देख मचल उठा और ताली बजा-बजा कर कूदने लगा। उन श्वेत बच्चों को मेरे बेटे का कूदना कुछ अटपटा सा लगा और उन्होंने उससे अंग्रेजी में कुछ बात करना चाहा किन्तु अंग्रेजी भाषा का ज्ञान न होने के कारण मेरा बेटा कुछ उत्तर न दे सका और अपनी ही धुन में कूदता रहा। वह अमेरिकन बच्चे भी छोटे ही थे। उन्हें पता नहीं क्या समझ आया। उन्होंने झल्ला कर मेरे बेटे पर दनादन बालू फेंकी। मेरा मासूम बेटा तड़प कर रो पड़ा। मेरे मातृत्व को यह बिलकुल बरदाश्त न हुआ। मैंने झट उसे गोदी में उठा सीने से लगा लिया। बेटे की वेदना असह्य थी। एक अपराध भाव था कि यदि मैंने उसे अंग्रेजी सिखाई होती तो उसे शायद आज यह दिन न देखना पड़ता। सोंचा, बहुत हो गयी हिन्दी। जब रहना यहीं है तो हिन्दी सिखाने का क्या औचित्य। हिन्दी के प्रति लिया गया यह मेरा एक और संकल्प था।
वह दिन यूँ ही वेदना के साथ नहीं कटा। आगे की बात फिर अगली बार लिखूंगी......
Thursday, May 7, 2009
एक संकल्प
मेरा बेटा अब दो वर्ष का था, और हिन्दी अच्छी तरह समझ सकता था। समझता था यही क्या कम था मेरे लिए। घर में एक मैं ही तो थी जो सारे समय उससे हिन्दी में बातें किया करती थी। शहर में नए थे इसलिए जान पहचान भी कुछ खास नहीं थी। कोई हिन्दी भाषी दोस्त नहीं थे। हमारे शहर में कोई भारतीय दुकानें या भारतीय रेस्टोरेन्ट भी नहीं थे। हिन्दी फिल्में देखना भी नहीं होता था। उस समय टी. वी. पर भी कोई भारतीय चैनल नहीं आता था। इन सबके बावजूद अपने बेटे को हिन्दी सिखाने की चाह कुछ ऐसी थी मानो एक बियाबान जंगल में एक माँ अकेले अपने बेटे का हाथ पकड़े किसी अनजान पथ पर चली जा रही हो। यह रास्ता कैसे और कहाँ ले जाएगा इसका न ही कोई पता था न परवाह। एक धुन सी थी। साथ था तो बस एक संकल्प और एक दृढ़ विश्वास। पर इस विश्वास को टूटते भी ज्यादा समय नहीं लगा.......
काश आज समय होता तो आज ही उस घटना को भी लिखती। समय जितना करा ले उसी में सन्तुष्ट रहना चाहिए ऐसा सोंच कर आज यहीं रूकती हूँ। जल्दी ही फिर लौटूंगी.........
काश आज समय होता तो आज ही उस घटना को भी लिखती। समय जितना करा ले उसी में सन्तुष्ट रहना चाहिए ऐसा सोंच कर आज यहीं रूकती हूँ। जल्दी ही फिर लौटूंगी.........
Monday, May 4, 2009
सास से मिली सलाह
जब मेरा पहला बेटा पैदा हुआ तब मेरी सास ने, जो श्वेत अमेरिकन है, मुझे सलाह दी कि मैं अपने बेटे को हिन्दी अवश्य सिखाऊँ। मुझे आश्चर्य हुआ कि वह स्वंम हिन्दी समझती नहीं फिर वह ऐसा क्यों चाहती हैं। तब उन्होने मुझे बताया कि उनकी नानी जो कनाडा के क्यूबेक प्रांत से थीं उन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती थी। वह केवल फ्रैंच ही बोल समझ सकती थीं और भाषा के अभाव में उनका अपनी नानी के साथ कोई भावनात्मक रिश्ता नहीं बन सका। अपने दिल के किसी कोने में वह उस रिश्ते की कमज़ोरी का दर्द छुपाए जी रही थीं। वह नहीं चाहती थीं कि भाषा के अभाव में, संवाद हीनता के कारण उनके पोते-पोतियाँ अपने नाना-नानी से और अपनी भारतीय जड़ों से जुड़ने से वंचित रह जाएं। उनकी पीड़ा को सुनने के बाद मैंने संकल्प लिया कि मैं अपने बच्चों को हरसंम्भव तरीके से हिन्दी अवश्य सिखाऊंगी किन्तु यह इतना सरल भी नहीं था।
अपने आगे की यात्रा फिर अगली बार.......
अपने आगे की यात्रा फिर अगली बार.......
Friday, May 1, 2009
हिन्दी क्यों सिखाएँ
विदेशों में रहने वाले उत्तर भारतीय बहुत से परिवारों में एक यह प्रश्न उठते देखा है कि आखिर हम अपने बच्चों को हिन्दी क्यों सिखाएँ। वे माता पिता जो अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़े और अपने परिवार और मित्रों के साथ अंग्रेज़ी बोलते हुए बड़े हुए उन्हें कभी-कभी हिन्दी सिखाने का महत्व समझ नहीं आता। मैं उन्हें दोष भी नहीं देती क्यों कि भारत में अंग्रेज़ी केवल भाषा का स्थान ही लेती है। संस्कृति हमारी फिर भी हिन्दुस्तानी ही रहती है। हिन्दी भाषा हिन्दुस्तानी (भारतीय) संस्कृति को सिखाने की दिशा में उठाया गया एक सशक्त कदम होता है।
यहाँ विदेशों में बच्चों को बड़े-छोटे का भाव, आदर और प्रेम का भाव सिखा पाना बड़ा कठिन होता है। यह हमारी भारतीय संस्कृति की विशेषता है। पाश्चात्य संस्कृति में इसका कोई विशेष महत्व नहीं। बच्चों के साथ उनके नाना-नानी या दादा-दादी भी अधिकतर नहीं होते जिससे वह अपने माता-पिता के साथ उनके आदर तथा प्रेम भाव को देख-सीख सकें। फिर यदि भाषा को देखें तो अंग्रेज़ी में केवल यू शब्द का प्रयोग बड़े छोटे सभी लोगों के लिए होता है। ऐसे में हिन्दी भाषा द्वारा बच्चों में भारतीय संस्कृति को सहज ही उतारा जा सकता है।
हिन्दी भाषा इतनी समृद्ध है जितनी कि भारतीय संस्कृति और यदि बच्चों को प्यार और जतन के साथ हिन्दी भाषा सिखाई जाए तो भारतीय संस्कृति स्वतः ही उनके चरित्र में उतरनी शुरु हो जाती है।
अगली बार अपने जीवन के कुछ अनुभव ले कर फिर आपसे बातचीत करने आऊँगी।
यहाँ विदेशों में बच्चों को बड़े-छोटे का भाव, आदर और प्रेम का भाव सिखा पाना बड़ा कठिन होता है। यह हमारी भारतीय संस्कृति की विशेषता है। पाश्चात्य संस्कृति में इसका कोई विशेष महत्व नहीं। बच्चों के साथ उनके नाना-नानी या दादा-दादी भी अधिकतर नहीं होते जिससे वह अपने माता-पिता के साथ उनके आदर तथा प्रेम भाव को देख-सीख सकें। फिर यदि भाषा को देखें तो अंग्रेज़ी में केवल यू शब्द का प्रयोग बड़े छोटे सभी लोगों के लिए होता है। ऐसे में हिन्दी भाषा द्वारा बच्चों में भारतीय संस्कृति को सहज ही उतारा जा सकता है।
हिन्दी भाषा इतनी समृद्ध है जितनी कि भारतीय संस्कृति और यदि बच्चों को प्यार और जतन के साथ हिन्दी भाषा सिखाई जाए तो भारतीय संस्कृति स्वतः ही उनके चरित्र में उतरनी शुरु हो जाती है।
अगली बार अपने जीवन के कुछ अनुभव ले कर फिर आपसे बातचीत करने आऊँगी।
Tuesday, April 28, 2009
शुभारंभ
आज अपने इस पन्ने का आरम्भ मैं अपने तीनों बच्चों को धन्यवाद दे कर करना चाहूँगी जिन्होंने मुझे एक माँ ही नहीं बल्कि एक टीचर बनने का सुअवसर भी दिया। इसके साथ ही उन सभी अभिभावकों को अपना धन्यवाद दूँगी जिन्होंने मुझमें अपना विश्वास दिखाया और अपने बच्चों में हिन्दी के प्रति प्यार बढ़ाने का एक अद्भुद कदम उठाया।
१९९२ में जब मैं विवाहित हो कर यू एस ए आई तब सब कुछ पीछे छूट जाने के बाद भी मेरी भाषा और संस्कृति अवश्य मेरे साथ सात समुन्दर पार आई और इस विदेशी परिवेश में मेरी अन्तरंग सहेली बन कर अब तक मेरा साथ निभाती आयी है। पिछले चौदह वर्षो से हिन्दी सिखाने की भी अपनी एक यात्रा रही है। अपनी इस यात्रा का ताना बाना अब अगली बार बुनूँगी
१९९२ में जब मैं विवाहित हो कर यू एस ए आई तब सब कुछ पीछे छूट जाने के बाद भी मेरी भाषा और संस्कृति अवश्य मेरे साथ सात समुन्दर पार आई और इस विदेशी परिवेश में मेरी अन्तरंग सहेली बन कर अब तक मेरा साथ निभाती आयी है। पिछले चौदह वर्षो से हिन्दी सिखाने की भी अपनी एक यात्रा रही है। अपनी इस यात्रा का ताना बाना अब अगली बार बुनूँगी
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