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Wednesday, June 3, 2009

ये उम्र और लंगड़ी



आज एक पूरा हफ्ता निकल गया कोई ब्लाग नहीं लिखा गया। तो प्रश्न है कि “आखिर क्यों नहीं लिखा गया?”
अकस्मात् बस एक ही उत्तर दिमाग में कौंधता है और वह यह कि- “जी लंगड़ी खेल रहे थे।“ तो ये लिजिए एक और प्रश्न सामने आ खड़ा होता है- “ये उम्र और लंगड़ी?”

सच! कितना मज़ा आता था बचपन में लंगड़ी खेलने का। छठी-सातवीं कक्षा। स्कूल समाप्त होने के बाद, स्कूल के ही सामने चौरसिया जी के घर पर जमे लंगड़ी खेल में शामिल होने से नहीं चूकते थे। पाँच मिनट के लिए ही सही। गलियारे से लम्बे खिंचे घर जहाँ सूरज कभी चुप-छुप के ही झांकता होगा। अंधियारी, तरावट भरी कोठरियों में एक दूसरे के पीछे दौड़ती हम सभी दोस्तें भूतों की तरह लंगड़ी खेलते थे। थोड़े समय में ज्यादा आनन्द लूटने की वह उम्र कुछ और ही होती है।

पर यहाँ विदेश में लंगड़ी?

यहाँ विदेश में घर के अन्दर-बाहर सभी काम निपटाते सुबह से शाम कब हो जाती है पता ही नहीं चलता। कुछ काम पति संभालता है तो कुछ काम पत्नी। ऐसे में यदि दोनों में से एक भी शहर से बाहर हो तो भाई टांगे तो दो ही हैं ना। आधा काम एक टांग करती है तो आधा दूसरी, और आप मानें या ना मानें अनजाने में ही इस आपाधापी में बच्चों को उठाए-लटकाए हम लंगड़ी खेलते नज़र आते हैं। अब ये हम पर है कि इस लंगड़ी का आनन्द हम लें या न लें। सच बात तो यह है कि जीवन की संध्या हमें सचमुच की लंगड़ी खिलाने लगे इससे पहले हम इस लंगड़ी का भी भरपूर आनन्द उठाएँ इसी में जीवन का असली आनन्द है।

पर इस सबके बावजूद हिन्दी की कक्षा अपने नियत समय पर रविवार के दिन पूरे उत्साह के साथ हुयी। उसके बारे में अगली बार....

नमस्कार।